ग़ज़ल
आज फिर उम्र की शाख़ से टूट कर एक लमहा ख़ला में बिखर जायेगा
इस् मुलाक़ात् का आख़्री ख़ाब भी मेरी आंखों में घुट घुट के मर जायेगा
एक यक़ीं था कि जिस का सहारा लिये मैंने पंजों के बल ज़िंदगी काट दी
कैसे कह दूं मेरी छत से वोह धूप में सिर्फ़ ज़ुल्फ़ें सुखाकर उतर जाएगा
ख़ुश्बुओं से सभी वास्ते तोड्कर यूं मुसलसल किसी फूल को देखना
ये अज़ीय्यत अगर यूं ही जारी रही एक दिन मेरा एहसास मर जायेगा
साएबानों में पाला गया है इसे ये खुले आसमानों से वाक़िफ़ नहीं
मान लो धूप की ज़द में आ भी गया छांव को देखते ही ठहर जायेगा
हिज्र् का मरहला भी गुज़र जायेगा जैसे लाखों मराहिल से गुज़्रे हैं हम
मेरी मंज़िल तो ये मयकदा आ गया हमसफ़र ये बता तू किधर जायेगा
No comments:
Post a Comment