ग़ज़ल
क्या ख़्वाहिशे हस्ती है न कह पाया बहुत देर
क्या ख़्वाहिशे हस्ती है न कह पाया बहुत देर
फिर ले के किसी नाम को शरमाया बहुत देर
वीरानी ने चुपके से कोई नाम लिया था
वहशत ने फिर उस नाम को दोहराया बहुत देर
ख़ंजर से ज़ियादा उसे इस बात का गम है
ज़ालिम ने हवा में उसे लहराया बहुत देर
रौशन है हर इक राह मगर उसकी गली में
महताब ने इक नूर को बरसाया बहुत देर
कुछ तुर्फ़ा शग़फ़ है उसे बीनाई से मेरी
वो जा भी चुका फिर भी नज़र आया बहुत देर
जिस बात को कहने में ज़बाँ काँप रही थी
दिल ने उसे ख़ामोशी से फ़रमाया बहुत देर
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