ग़ज़ल
अगर ग़ुस्से में साइल बैठ जाए
दरो दीवार का दिल बैठ जाए
ज़रूरी है हवा भी सर झुका कर
चिराग़ों के मुक़ाबिल बैठ जाए
उसे अब ताबे रुसवाई नहीं है
दुआ माँगो कि क़ातिल बैठ जाए
तलातुम क्या बिगाड़ेगा हमारा
इरादों में जो साहिल बैठ जाए
इलाही ख़ैर हो दिल की गली में
है इतना हब्स के दिल बैठ जाए
कहाँ फिर फ़िक्रे नज़्ज़ारा रहेगी
ज़रा आँखों में वो तिल बैठ जाए
जुनूँ तो फिर जुनूँ है उसके दर पे
क़दमबोसी को मुश्किल बैठ जाए
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