Saturday, September 19, 2009

MANZAR......

Zaum-e-sannaai sukhanwar se gaya
yaani ek aaseb tha sar se gaya

shauq milne ka bicharne ka malaal
waswasa ye bhi mere dar se gaya

Zindgi ek barg he sookha hua
shakh se toota to manzar se gaya

Friday, September 4, 2009

सोचता हूँ ......

अब कोई रिश्ता हमारे दरमियाँ बाक़ी नहीं है
मैं यहाँ रोया करूंगा वो वहां रोया करेगा

मेरी यादों ही ने उसको कोनसी तिस्कीन दी है
सोचता हूँ वो मुझे अब भूल कर भी क्या करेगा

Wednesday, September 2, 2009

रहगुज़र.....
जो चाहते थे वही बात कर नहीं आई
हमारे साथ भी गर्देसफ़र नहीं आई

मैं जंग हार के लौटा तो इतना तन्हा था
मिरी अना भी मिरे साथ घर नहीं आई

उसे किसी ने कभी बेवफ़ा नहीं समझा
उसे किसी मैं शराफ़त नज़र नहीं आई

बस एक बार हंसा था किसी के जाने पर
फिर उसके बाद हँसी लौट कर नहीं आई

हमारी आँखों में मंज़िल तो आ गयी लेकिन
हमारे पांव तले रहगुज़र नहीं आई


परचम....

एक खु़शी के लिए मातम नहीं फेंके जाते
फ़तह के बाद भी परचम नहीं फेंके जाते

ये ज़मीनों से खलाओं की तरफ़ जाते हैं
आसमानों से कभी ग़म नहीं फेंके जाते

उसने जाते हुए हंसने की दुआएं दी हैं
यूं किसी ज़ख्म पे मरहम नहीं फेंके जाते

रंज बढ़ते हैं तो मैं ज़ोर से हंस पड़ता हूँ
अपनी आंखों से ये दिरहम नहीं फेंके जाते



Sunday, August 30, 2009

सिलसिला....

दोस्ती भी रही ख़फा भी रहे
सिर्फ़ इतने कि सिलसिला भी रहे

कैसे मुमकिन है बंद कमरों में
आबरू भी रहे हवा भी रहे

बारिशें भी न हों न धूप खिले
और आँगन हरा भरा भी रहे

सोचता है कि शब् को शब् कह दे
चाहता है कि वो भला भी रहे

जालिमों के लिए ज़रूरी है
बेबसों के लिए खुदा भी रहे.

Friday, August 28, 2009

बचपन....

कैसे कह दूँ सारा चेहरा रोशन था
मेरी आंखों पर तो उनका दामन था

मैं समझा शायद मजबूरी आई हो
दरवाज़ा खोला तो मेरा बचपन था

Saturday, July 25, 2009

मां ...

जैसी बच्चों को मां से आती है

अब वो खुशबू कहाँ से आती है

हो के हेराँ ज़मीं को मत देखो

रौशनी आसमां से आती है

कोई बच्चा यहाँ नहीं आता

फिर ये मिट्टी कहाँ से आती है

पहला लफ़्ज़ ....

तुम कि बस आराम-ऐ-जाँ लिखते रहे
हम  क़लम  से  आंधियां  लिखते  रहे

तंग दस्ती  क्या   मज़े   की   चीज़  है
हम  ज़मीं  को  आसमां  लिखते   रहे

एक   कुर्सी   पर   बुढ़ापा   सो   गया
और   बच्चे   तख्तियां   लिखते    रहे

वो  हमारे  लबों  का  पहला लफ़्ज़ थी
बस  उसे  बचपन  से   माँ  लिखते रहे