HAIRAÑ-HAIRAÑ
URDU POETRY
Thursday, October 13, 2011
डर۔۔۔۔
डर.....
ज़माना यूँ ही परेशाँ है आह भरता है
तेरा ख़याल मुझे छू के कब गुज़रता है
वो सारे जिस्म में दिल की तरह धड़कता है
दिमाग़ है कि ये सच मानने से डरता है।
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