Sunday, August 30, 2009

सिलसिला....

दोस्ती भी रही ख़फा भी रहे
सिर्फ़ इतने कि सिलसिला भी रहे

कैसे मुमकिन है बंद कमरों में
आबरू भी रहे हवा भी रहे

बारिशें भी न हों न धूप खिले
और आँगन हरा भरा भी रहे

सोचता है कि शब् को शब् कह दे
चाहता है कि वो भला भी रहे

जालिमों के लिए ज़रूरी है
बेबसों के लिए खुदा भी रहे.

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