Saturday, July 25, 2009

पहला लफ़्ज़ ....

तुम कि बस आराम-ऐ-जाँ लिखते रहे
हम  क़लम  से  आंधियां  लिखते  रहे

तंग दस्ती  क्या   मज़े   की   चीज़  है
हम  ज़मीं  को  आसमां  लिखते   रहे

एक   कुर्सी   पर   बुढ़ापा   सो   गया
और   बच्चे   तख्तियां   लिखते    रहे

वो  हमारे  लबों  का  पहला लफ़्ज़ थी
बस  उसे  बचपन  से   माँ  लिखते रहे

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