Wednesday, September 2, 2009

रहगुज़र.....
जो चाहते थे वही बात कर नहीं आई
हमारे साथ भी गर्देसफ़र नहीं आई

मैं जंग हार के लौटा तो इतना तन्हा था
मिरी अना भी मिरे साथ घर नहीं आई

उसे किसी ने कभी बेवफ़ा नहीं समझा
उसे किसी मैं शराफ़त नज़र नहीं आई

बस एक बार हंसा था किसी के जाने पर
फिर उसके बाद हँसी लौट कर नहीं आई

हमारी आँखों में मंज़िल तो आ गयी लेकिन
हमारे पांव तले रहगुज़र नहीं आई


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