ग़ज़ल
परिन्दे आँधियों में रुक गये हैं
नतीजे फ़ैसलों में रुक गये हैं
खुले में घूमते हैं ग़म के मारे
बस अंदेशे घरों में में रुक गये हैं
मुहब्बत की वो रुसवाई हुई है
तनाज़े दोस्तों में रुक गये हैं
उसे हद से ज़ियादा देखने में
कई आँसू हदों में रुक गये हैं
तमन्नाओं को है बस ये निदामत
मुसाफ़िर रास्तों में रुक गये हैं
पहुँचने हैं वही मंज़िल पे अपनी
जो उनके गेसुओं में रुक गये हैं
ज़बाँ ख़ामोश ख़ुश्की है लबों पर
क़दम बैसाखियों में रुक गये हैं
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