Wednesday, March 11, 2020

ग़ज़ल

परिन्दे आँधियों  में रुक गये  हैं
नतीजे फ़ैसलों  में  रुक गये  हैं

खुले में  घूमते  हैं  ग़म के  मारे
बस अंदेशे घरों में में रुक गये हैं

मुहब्बत की  वो रुसवाई हुई  है
तनाज़े  दोस्तों  में  रुक  गये  हैं

उसे हद  से  ज़ियादा  देखने  में
कई  आँसू  हदों  में  रुक गये हैं

तमन्नाओं को है बस ये निदामत
मुसाफ़िर रास्तों  में  रुक गये  हैं

पहुँचने हैं वही मंज़िल पे अपनी
जो उनके गेसुओं में रुक गये हैं

ज़बाँ ख़ामोश ख़ुश्की है लबों पर
क़दम बैसाखियों में रुक  गये हैं

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